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पूजाओं का महत्व और विधि

कौन सी पूजा क्यों की जाती है

बहुत से लोग पूजा कराना चाहते हैं पर यह नहीं जानते कि उसमें होता क्या है। यहाँ बारह पूजाओं और संस्कारों के बारे में सरल भाषा में लिखा है: क्या है, महत्व क्या माना जाता है, कब की जाती है और विधि में क्या क्या होता है।

गृह प्रवेश पूजा

नए घर में पहला क़दम

क्या है

नया घर बनने या ख़रीदने के बाद उसमें रहने से पहले जो पूजा की जाती है, उसे गृह प्रवेश कहते हैं। इसमें वास्तु देवता, गणेश जी और कुल देवता का आवाहन होता है, हवन किया जाता है और रसोई में पहली बार चूल्हा जलाकर दूध उबाला जाता है।

महत्व

मान्यता है कि घर सिर्फ़ ईंट और सीमेंट का ढाँचा नहीं होता, उसमें रहने वालों का सुख उसी वातावरण से जुड़ा रहता है। गृह प्रवेश उसी वातावरण को शुद्ध करने और घर को बसाने की परंपरा है। दूध का उबलकर बाहर आना समृद्धि का संकेत माना जाता है, और इसीलिए यह विधि हर परिवार में की जाती है।

कब की जाती है

गृहस्थी शुरू करने से पहले, यानी सामान रखने और रहने से पहले। शुभ तिथि देखकर, आम तौर पर सुबह के मुहूर्त में। कुछ मास और तिथियाँ इसके लिए वर्जित मानी जाती हैं, इसलिए तारीख़ पंडित जी से निकलवाना ज़रूरी है।

विधि में क्या होता है

  • मुख्य द्वार पर तोरण, आम के पत्ते और स्वस्तिक
  • कलश स्थापना और गणेश पूजन से शुरुआत
  • वास्तु शांति और नवग्रह का पूजन
  • हवन, फिर पूरे घर में गंगाजल का छिड़काव
  • रसोई में पहली बार चूल्हा जलाकर दूध उबालना
  • अंत में ब्राह्मण भोज या प्रसाद वितरण

ध्यान रखें

  • जिस दिन प्रवेश हो उस दिन घर पूरी तरह ख़ाली न हो, कम से कम रसोई का सामान पहले पहुँच जाए
  • गृह प्रवेश के बाद उसी दिन घर में रात बिताने की परंपरा है, बहुत से परिवार इसे ज़रूरी मानते हैं
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सत्यनारायण कथा

घर की सबसे आम पूजा

क्या है

भगवान विष्णु के सत्यनारायण रूप की पूजा, जिसमें पाँच अध्याय की कथा सुनी जाती है। कथा में साधु वणिक, राजा उल्कामुख और लकड़हारे जैसी कहानियाँ आती हैं, जिनका सार एक ही है: दिए हुए वचन को निभाना और प्रसाद का अनादर न करना।

महत्व

यह घरों में सबसे ज़्यादा की जाने वाली पूजा है, क्योंकि इसके लिए न बड़ी तैयारी चाहिए न ज़्यादा समय। मान्यता है कि जो मन्नत पूरी हो जाए उसके बाद यह कथा करानी चाहिए, इसीलिए इसे धन्यवाद की पूजा भी कहा जाता है। नए काम की शुरुआत, विवाह के बाद, या घर में कोई शुभ काम होने पर यह कराई जाती है।

कब की जाती है

पूर्णिमा को इसका विशेष महत्व माना जाता है, और संक्रांति व एकादशी को भी। वैसे यह किसी भी शुभ दिन कराई जा सकती है, आम तौर पर शाम के समय।

विधि में क्या होता है

  • कलश स्थापना, गणेश पूजन और नवग्रह का आवाहन
  • सत्यनारायण भगवान की मूर्ति या चित्र का षोडशोपचार पूजन
  • पाँचों अध्याय की कथा, परिवार सहित बैठकर सुनना
  • आरती, फिर पंचामृत और सिन्नी (आटा, चीनी, केला, घी) का भोग
  • प्रसाद सबमें बाँटना, यही कथा का मुख्य भाव है

ध्यान रखें

  • कथा शुरू होने के बाद बीच में उठना अच्छा नहीं माना जाता, इसलिए सब पहले से बैठ जाएँ
  • प्रसाद ज़रूर ग्रहण करें, कथा में इसी का सबसे ज़्यादा ज़ोर है
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रुद्राभिषेक

शिवजी का जलाभिषेक

क्या है

शिवलिंग पर एक के बाद एक द्रव्य चढ़ाकर किया जाने वाला अभिषेक, साथ में रुद्री (श्री रुद्रम) का पाठ। जल, दूध, दही, घी, शहद और शक्कर, इन्हीं से पंचामृत बनता है, और अंत में फिर शुद्ध जल चढ़ाया जाता है।

महत्व

मान्यता है कि शिवजी को कोई महँगी भेंट नहीं चाहिए, वे जल से ही प्रसन्न हो जाते हैं, इसीलिए इस पूजा को सबसे सरल और सबसे प्रिय माना गया है। रुद्राभिषेक ग्रह बाधा, मानसिक अशांति और घर के क्लेश के समय कराया जाता है, और कई परिवार इसे हर साल एक बार नियम से कराते हैं।

कब की जाती है

सोमवार, प्रदोष और श्रावण मास में इसका विशेष महत्व माना जाता है। महाशिवरात्रि की रात चारों प्रहर की पूजा होती है। वैसे यह किसी भी दिन कराई जा सकती है।

विधि में क्या होता है

  • गणेश पूजन और संकल्प से शुरुआत
  • शिवलिंग पर क्रम से जल, दूध, दही, घी, शहद और शक्कर
  • साथ साथ रुद्री का पाठ, ग्यारह बार पढ़ने को एकादश रुद्री कहते हैं
  • बेलपत्र, धतूरा, भाँग और सफ़ेद फूल चढ़ाना
  • भस्म और चंदन का लेप, फिर आरती

ध्यान रखें

  • शिवजी को केतकी का फूल और तुलसी दल नहीं चढ़ाए जाते, यह परंपरा हर जगह मानी जाती है
  • बेलपत्र तीन पत्तों वाला और बिना कटा हुआ होना चाहिए
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नामकरण संस्कार

बच्चे का नाम रखने की विधि

क्या है

जन्म के बाद बच्चे का नाम रखने का संस्कार। सोलह संस्कारों में यह पाँचवाँ है। जन्म के समय के नक्षत्र से एक अक्षर निकलता है, और परंपरा से नाम उसी अक्षर से शुरू किया जाता है।

महत्व

मान्यता है कि नाम जीवन भर साथ चलता है और व्यक्ति की पहचान बनता है, इसलिए उसे यूँ ही नहीं, विधि से रखा जाता है। इस दिन बच्चे को पहली बार परिवार और समाज के सामने औपचारिक रूप से लाया जाता है, और बड़े बुज़ुर्ग आशीर्वाद देते हैं।

कब की जाती है

परंपरा के अनुसार जन्म के ग्यारहवें, बारहवें या सोलहवें दिन। कुछ परिवारों में इसे इक्कीसवें दिन या पहले महीने के भीतर भी किया जाता है।

विधि में क्या होता है

  • गणेश पूजन और नवग्रह का आवाहन
  • जन्म नक्षत्र देखकर नाम का अक्षर निकालना
  • हवन, फिर पिता या दादा का बच्चे के कान में नाम कहना
  • बच्चे को सूर्य के दर्शन कराना
  • बड़ों का आशीर्वाद और प्रसाद वितरण

ध्यान रखें

  • नक्षत्र वाला अक्षर और घर में पुकारा जाने वाला नाम अलग अलग रखे जा सकते हैं, बहुत से परिवार ऐसा ही करते हैं
  • बच्चा छोटा है, इसलिए विधि छोटी और शांत रखिए, हवन का धुआँ ज़्यादा न हो
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मुंडन संस्कार

पहली बार बाल उतारना

क्या है

बच्चे के जन्म के बाद पहली बार सिर के बाल उतारने का संस्कार, जिसे चूड़ाकर्म भी कहते हैं। पूजा के बाद नाई बाल उतारता है और वे बाल जल में प्रवाहित किए जाते हैं या मंदिर में चढ़ाए जाते हैं।

महत्व

मान्यता है कि जन्म के समय के बाल उतारने से बच्चा शुद्ध होता है और उसका स्वास्थ्य अच्छा रहता है। बहुत से परिवार यह संस्कार अपने कुल देवता के मंदिर में जाकर कराते हैं, और खाटू श्याम जी, सालासर तथा मेहंदीपुर बालाजी में यह बहुत होता है।

कब की जाती है

आम तौर पर पहले, तीसरे या पाँचवें वर्ष में, विषम वर्ष में करने की परंपरा है। शुभ तिथि और नक्षत्र देखकर दिन तय होता है।

विधि में क्या होता है

  • गणेश पूजन और संकल्प
  • बच्चे को माता या मामा की गोद में बिठाना
  • पंडित जी के मंत्र के साथ पहली लट काटना, फिर नाई पूरा मुंडन करता है
  • सिर पर हल्दी और चंदन का लेप
  • बाल जल में प्रवाहित करना या मंदिर में चढ़ाना

ध्यान रखें

  • मुंडन के बाद सिर पर धूप और ठंड दोनों जल्दी लगते हैं, टोपी या कपड़ा साथ रखिए
  • धाम में मुंडन कराना हो तो बुकिंग के समय बता दीजिए, वहाँ की व्यवस्था अलग से देखनी पड़ती है
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जनेऊ, उपनयन संस्कार

यज्ञोपवीत धारण

क्या है

यज्ञोपवीत यानी जनेऊ धारण करने का संस्कार, जिसे उपनयन कहते हैं। इसमें बालक को गायत्री मंत्र की दीक्षा दी जाती है और तीन धागों वाला जनेऊ पहनाया जाता है।

महत्व

मान्यता है कि इसी संस्कार से विद्या आरंभ होती है, इसीलिए इसे दूसरा जन्म भी कहा जाता है। जनेऊ के तीन धागे तीन ऋणों के प्रतीक माने जाते हैं: देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण। पहनने वाले से अपेक्षा रहती है कि वह संयम और सफ़ाई का नियम निभाए।

कब की जाती है

परंपरा के अनुसार बालक की आयु आठ से सोलह वर्ष के बीच। विवाह से पहले यह संस्कार करा लेने की परंपरा है, और बहुत जगह विवाह के दिन ही करा दिया जाता है।

विधि में क्या होता है

  • गणेश पूजन, नवग्रह और हवन
  • बालक का मुंडन और स्नान
  • गुरु या पंडित जी द्वारा गायत्री मंत्र की दीक्षा, कान में
  • जनेऊ धारण और दंड, मेखला तथा मृगचर्म का ग्रहण
  • भिक्षा की परंपरा, पहले माता से

ध्यान रखें

  • जनेऊ पहनने के बाद कुछ नियम निभाने होते हैं, वे पंडित जी उसी दिन समझा देते हैं, परिवार भी सुन ले तो अच्छा
  • धागा गंदा या टूट जाए तो बदला जाता है, फेंका नहीं जाता
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विवाह और सगाई

सोलह संस्कारों में सबसे बड़ा

क्या है

विवाह की पूरी विधि, जिसमें सगाई से लेकर फेरे और विदाई तक कई चरण होते हैं। मुख्य भाग कन्यादान, पाणिग्रहण, सात फेरे और सप्तपदी है, और अंत में ध्रुव तारे के दर्शन की परंपरा है।

महत्व

मान्यता है कि विवाह केवल दो लोगों का नहीं, दो परिवारों और दो परंपराओं का जुड़ाव है। सात फेरों में सात वचन लिए जाते हैं, और सप्तपदी के सातों क़दम अन्न, बल, धन, सुख, संतान, ऋतु और मित्रता के संकल्प माने जाते हैं। यही कारण है कि इसे सोलह संस्कारों में सबसे बड़ा कहा गया है।

कब की जाती है

विवाह के मुहूर्त पंचांग से निकाले जाते हैं और साल में गिने चुने दिन ही आते हैं। चातुर्मास, यानी देवशयनी एकादशी से देवउठनी एकादशी तक, विवाह नहीं किए जाते। खरमास में भी नहीं।

विधि में क्या होता है

  • सगाई, तिलक और गणेश पूजन से शुरुआत
  • हल्दी, मंडप स्थापना और मातृका पूजन
  • वर पक्ष की अगवानी, जयमाला
  • कन्यादान, पाणिग्रहण और अग्नि के सामने सात फेरे
  • सप्तपदी, सिंदूर दान, मंगलसूत्र और ध्रुव तारे के दर्शन

ध्यान रखें

  • मुहूर्त के दिन गिने चुने होते हैं, इसलिए तारीख़ महीनों पहले निकलवा लीजिए
  • दोनों परिवारों की परंपरा में थोड़ा अंतर होता है, विधि पहले ही बैठकर तय कर लेना सबसे अच्छा रहता है
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भागवत कथा और अखंड रामायण

कई दिन चलने वाला आयोजन

क्या है

श्रीमद्भागवत कथा आम तौर पर सात दिन चलती है, जिसे सप्ताह कहते हैं, और इसमें व्यास गद्दी पर बैठकर कथावाचक प्रसंग सुनाते हैं। अखंड रामायण में रामचरितमानस का पूरा पाठ बिना रुके चौबीस घंटे में पूरा किया जाता है।

महत्व

मान्यता है कि कथा सुनने से मन शांत होता है और घर का वातावरण बदलता है। ये आयोजन अकेले नहीं होते, पूरा मोहल्ला या परिवार जुड़ता है, इसीलिए इन्हें साथ बैठने का अवसर भी माना जाता है। बहुत से परिवार किसी के जाने के बाद उनकी स्मृति में यह कराते हैं।

कब की जाती है

अखंड रामायण चौबीस घंटे की होती है, इसलिए एक दिन में पूरी हो जाती है। भागवत सप्ताह के लिए सात दिन चाहिए और उसके लिए जगह, बैठने की व्यवस्था और भोजन की तैयारी पहले से करनी पड़ती है।

विधि में क्या होता है

  • कलश यात्रा और व्यास गद्दी की स्थापना
  • रोज़ तय समय पर कथा, बीच में भजन और आरती
  • अखंड पाठ में पाठ करने वाले बारी बारी बैठते हैं ताकि पाठ रुके नहीं
  • अंतिम दिन हवन और पूर्णाहुति
  • भंडारा या प्रसाद वितरण

ध्यान रखें

  • इसमें एक से ज़्यादा पंडित जी और कथावाचक लगते हैं, इसलिए बहुत पहले से बताना पड़ता है
  • जगह, बैठने की व्यवस्था, बिजली और भोजन की तैयारी आयोजक को ही देखनी होती है
💬 इस पूजा के लिए पंडित जी पूछें

श्राद्ध और तर्पण

पितरों के लिए

क्या है

पितरों के निमित्त किया जाने वाला कर्म, जिसमें जल से तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोजन होता है। पिंड चावल या जौ के आटे से बनाए जाते हैं और कुश तथा तिल के साथ अर्पित किए जाते हैं।

महत्व

मान्यता है कि जिन्होंने हमें जन्म और संस्कार दिए, उनके प्रति कृतज्ञता जताना संतान का कर्तव्य है, और श्राद्ध उसी कृतज्ञता का रूप है। कौए, गाय, कुत्ते और चींटी के लिए भी अंश निकाला जाता है, इसे यह याद दिलाने वाली परंपरा माना जाता है कि भोजन पर सबका हिस्सा है।

कब की जाती है

पितृ पक्ष के सोलह दिनों में, और उसमें भी उसी तिथि को जिस तिथि को देहावसान हुआ था। जिनकी तिथि मालूम न हो उनके लिए अमावस्या, यानी सर्वपितृ अमावस्या रखी गई है। गया, हरिद्वार और प्रयाग में यह वर्ष भर होता है।

विधि में क्या होता है

  • दक्षिण दिशा की ओर मुख, हाथ में कुश और तिल
  • जल, तिल और जौ से तर्पण
  • चावल या जौ के आटे के पिंड बनाकर अर्पण
  • कौए, गाय, कुत्ते और चींटी के लिए अंश निकालना
  • ब्राह्मण भोजन और यथाशक्ति दान

ध्यान रखें

  • तिथि पहले से मालूम कर लीजिए, यह अंग्रेज़ी तारीख़ से नहीं, तिथि से तय होती है
  • इन दिनों घर में सात्विक भोजन बनता है, लहसुन प्याज से परहेज़ की परंपरा है
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वाहन और दुकान की पूजा

थोड़े समय में हो जाने वाली

क्या है

नई गाड़ी, नई दुकान, दफ़्तर या मशीन की पूजा। इसमें गणेश पूजन, नारियल फोड़ना, नींबू और मौली बाँधना तथा स्वस्तिक बनाना होता है। दुकान की पूजा में लक्ष्मी जी और कुबेर का पूजन भी जोड़ा जाता है।

महत्व

मान्यता है कि कोई भी नया काम शुरू करने से पहले गणेश जी का स्मरण किया जाता है, ताकि काम बिना विघ्न चले। वाहन पूजा में सुरक्षित यात्रा की कामना की जाती है, और दुकान की पूजा में बरकत की। यह सबसे छोटी पूजा है, आधे घंटे से भी कम में हो जाती है।

कब की जाती है

गाड़ी या दुकान लेने के दिन ही, या उसके बाद पहले शुभ मुहूर्त में। नवरात्रि, दशहरा, धनतेरस और दीपावली को नया सामान लेना विशेष शुभ माना जाता है।

विधि में क्या होता है

  • गणेश पूजन और संकल्प
  • गाड़ी या गल्ले पर स्वस्तिक और मौली
  • नारियल फोड़ना और नींबू रखना
  • दुकान की पूजा में लक्ष्मी और कुबेर का पूजन
  • आरती और प्रसाद वितरण

ध्यान रखें

  • नारियल खुली जगह पर फोड़िए, बंद जगह में काँच या सामान को नुक़सान हो सकता है
  • गाड़ी की पूजा सड़क के बीच में मत कीजिए, किनारे या पार्किंग में कराइए
💬 इस पूजा के लिए पंडित जी पूछें

🙏 ये सब बातें श्रद्धा और परंपरा पर आधारित हैं। क्षेत्र, परिवार और गुरु-परंपरा के अनुसार पूजा की विधि में अंतर मिलता है, इसलिए अपने पंडित जी और घर के बड़ों से पूछ लेना सबसे अच्छा रहता है। कोई बात सुधारने योग्य लगे तो हमें WhatsApp पर ज़रूर बताइए, हम उसे ठीक कर देंगे।

कौन सी पूजा करानी है? 🙏

पूजा का नाम और दिन बता दीजिए, मुहूर्त और पंडित जी दोनों की व्यवस्था हो जाएगी।