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बुज़ुर्गों के साथ तीर्थ यात्रा

बुज़ुर्ग माता पिता के साथ तीर्थ यात्रा कैसे कराएँ

माता पिता की उम्र हो चली है और वे धाम जाना चाहते हैं। मन तो सबका होता है, पर सवाल यह रहता है कि इतनी लंबी यात्रा वे कर पाएँगे या नहीं। यह पेज उसी सवाल का जवाब है, हमारे अपने अनुभव से।

440+यात्री ले जा चुके हैं
ज़्यादातरयात्री बुज़ुर्ग ही होते हैं
17pxसाइट के अक्षर, पढ़ने लायक़
आगे कीसीट, कहने पर

हमारे ज़्यादातर यात्री बुज़ुर्ग ही होते हैं, इसलिए पूरी यात्रा शुरू से उसी हिसाब से बनाई जाती है। सच यह है कि उम्र से ज़्यादा फ़र्क़ तैयारी से पड़ता है। 75 साल के यात्री आराम से दर्शन करके लौटते हैं और 55 के यात्री बिना तैयारी के थक जाते हैं। नीचे लिखा है कि असल में दिक़्क़त कहाँ आती है, हम क्या करते हैं, और आपको घर से क्या तैयारी करके भेजनी है।

असल में दिक़्क़त कहाँ आती है

हम क्या करते हैं

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आगे की सीट

कहने पर आगे की सीट दी जाती है, जहाँ हिलना कम लगता है और उतरना आसान रहता है।

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चढ़ने और उतरने में मदद

हर पिकअप और हर रुकाव पर सहायक हाथ पकड़कर चढ़ाता और उतारता है।

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लाइन में साथ

दर्शन की लाइन में हमारा यात्रा सहायक साथ खड़ा रहता है, अकेला नहीं छोड़ता।

व्हीलचेयर, पहले से बताने पर

ज़रूरत हो तो बुकिंग के समय बता दीजिए, व्यवस्था करा दी जाती है।

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परिवार को लाइव लोकेशन

घर बैठे बेटे बेटी को WhatsApp पर गाड़ी की लाइव लोकेशन मिलती रहती है।

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यात्रा बीमा

हर यात्री का ट्रैवल इंश्योरेंस किराए में ही शामिल रहता है।

घर से क्या तैयारी करके भेजें

कौन सी यात्रा उनके लिए आसान रहेगी

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खाटू श्याम, रात की यात्रा

रात को गाड़ी चलती है इसलिए सफ़र सोते हुए कट जाता है और सुबह ताज़ा दम दर्शन होते हैं। पर एकादशी और लक्खी मेले के दिन लाइन बहुत लंबी होती है, बुज़ुर्गों के लिए वो दिन छोड़ देना बेहतर है।

2

वृंदावन मथुरा, सबसे पास

दिल्ली से सबसे पास है और सड़क अच्छी है, इसलिए सफ़र सबसे कम थकाता है। ध्यान यह रखिए कि एक ही दिन में पाँच मंदिर होते हैं, यानी चलना सबसे ज़्यादा इसी में पड़ता है।

3

सालासर और खाटू, दो दिन में

इसमें रात का ठहराव है, इसलिए बीच में आराम मिल जाता है। जिनसे एक ही दिन में पूरा सफ़र नहीं होता, उनके लिए यह ज़्यादा आराम की यात्रा है।

पूछे जाने वाले सवाल

कितनी उम्र तक के यात्री जा सकते हैं?

हमने कोई उम्र की सीमा नहीं रखी है, और 80 पार के यात्री भी हमारे साथ जा चुके हैं। असल बात उम्र नहीं, चलने फिरने की हालत है। जो थोड़ी देर खड़े रह सकते हों और सहारे से चल लेते हों, वे आराम से यात्रा कर लेते हैं। ⚠️ हाल में कोई ऑपरेशन हुआ हो, या दिल, साँस या चक्कर की तकलीफ़ हो, तो यात्रा से पहले अपने डॉक्टर से एक बार ज़रूर पूछ लीजिए। यह सलाह हम नहीं दे सकते, वो आपके डॉक्टर का काम है।

अगर वे अकेले जा रहे हैं और घरवाले साथ नहीं हैं?

यह आम बात है और इसी के लिए दो चीज़ें बनी हैं। एक, यात्रा सहायक पूरे समय समूह के साथ रहता है, दर्शन की लाइन में भी। दो, घरवालों को WhatsApp पर गाड़ी की लाइव लोकेशन भेजी जाती है, तो आप घर बैठे देख सकते हैं कि वे कहाँ पहुँचे। बुकिंग के समय अपना नंबर दे दीजिए, लोकेशन उसी पर आएगी।

क्या व्हीलचेयर मिल जाती है?

जी हाँ, पर **पहले से बताना ज़रूरी है**। बुकिंग के समय बता दीजिए तो व्यवस्था करा दी जाती है। ऐन मौक़े पर मंदिर में व्हीलचेयर मिल जाए, यह पक्का नहीं होता, इसलिए वादा हम तभी करते हैं जब पहले से पता हो।

दर्शन की लंबी लाइन में वे खड़े नहीं रह सकते, तो?

पहली बात, ऐसे यात्रियों के लिए एकादशी, मेले और बड़े त्योहार की तारीख़ें छोड़ दीजिए, उन दिनों लाइन सबसे लंबी होती है। आम दिनों में सुबह जल्दी पहुँचने पर लाइन काफ़ी कम मिलती है और हमारी खाटू यात्रा इसीलिए रात को चलती है। बहुत से मंदिरों में बुज़ुर्गों और दिव्यांगों के लिए अलग रास्ता होता है, हमारा सहायक वहाँ पहुँचकर पूछता है और जो सुविधा उपलब्ध हो उसमें मदद करता है। ⚠️ पर यह मंदिर प्रशासन के हाथ में है, हमारे नहीं, इसलिए इसका वादा हम नहीं कर सकते।

क्या दर्शन हो ही जाएँगे?

नहीं, और यह हम साफ़ कह देते हैं। मंदिर की भीड़, लाइन की लंबाई और मंदिर प्रशासन के फ़ैसले हमारे हाथ में नहीं होते। हम लाइन में साथ रहते हैं और जो भी मदद हो सकती है वो करते हैं, पर दर्शन का वादा कोई नहीं कर सकता। जो करता है, वो सच नहीं बोल रहा।

माता पिता को दर्शन कराइए 🙏

कौन सी यात्रा उनके लिए ठीक रहेगी, यह हमसे पूछ लीजिए। उनकी उम्र और चलने फिरने की हालत बता दीजिए, हम सही सलाह देंगे।